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घुघुती! भै भुखू, मैं सूती।

  • Reetu
  • 5 days ago
  • 2 min read

Updated: 3 days ago


उत्तराखंड के गानों और कहानियों में 'घुघुती' का नाम आपने सुना ही होगा। यहां की प्रकृति में घुघुती निवास करती है। चैत के महीने में खूब सारी घुघुति देखने मिलती हैं। इससे सम्बंधित एक प्रसिद्ध कहानी है:


एक समय की बात है। एक गांव में ढोल बज रहे थे। शादी का माहौल था। चैतू की मां कहती है, "ऊपर देखकर आ, तेरी बहन घुघुति तैयार हुई कि नहीं!" मां का आदेश मानकर वह अपनी दीदी को देखने गया। घुघुती सुंदर सी पीली साड़ी पहन कर बैठी थी। हल्दी के कारण उसके हाथ चमक रहे थे। उसके बगल में उसकी सहेलियां हंसी मजाक कर रही थी। 


इतने में, उसका भाई आ जाता है। वह कहता है "दीदी चल, शायद मां हमें मिठाइयां खाने के लिए बुला रही है।" उसकी सहेली कहती है "ए चैतू! तेरी दीदी के खाने-पीने के दिन गए। अब उसके खिलाने-पिलाने के दिन हैं।" चैतू सोच में पड़ जाता है। अपनी दीदी से पूछता है–"दीदी तू कहां जा रही हैं?" शर्माती आंखों से घुघुती कहती है कि "चैतू अब मैं ससुराल जा रही हूं। शादी सिर्फ पकौड़े खाने के लिए थोड़ी होतो है। लड़की की विदाई भी होती है।"


चैतू का मन घबरा जाता है। घुघुती रो पड़ती है और कहती है, "जब चैत के महीने में सुंदर-सुंदर फूल खिलेंगे, हर जगह खुशियां होगी, उस महीने मैं तुझसे मिलने आउंगी।" और चैतू अपनी बहन को विदा कर देता है। उनको एक दूसरे की बहुत याद आती है। समय बीतता गया और चैतू बड़ा हो गया। काफ़ी समय तक घुघुती उससे मिलने नहीं आई। चैतू ने सोच लिया कि अब वह अपनी बहन से मिलने जाएगा। उसकी मां ने उसे खूब रोका पर उसने उनकी एक ना सुनी। सर पर भिटौली की टोकरी रख कर वह जंगल में चला गया। वह सोचता है कहीं इतने समय बाद उसकी दीदी उसे भूल तो नहीं गई होगी। मन में कई सवाल लिए वह उत्सुकता से आगे बढ़ता रहा। 


कुछ ही समय बाद वह घुघुती के गांव पहुंच गया। उसने देखा कि घुघुती सोई हुई है। उसने उसे जगाने का सोचा पर वह जगा नहीं पाया क्योंकि उस ज़माने में किसी को नींद से उठाना पाप था। फिर थक-हार कर उसने उसके गले में सोने की ज़ंजीर पहना दी और भिटौली का टोकरा रख दिया। घुघुती के लिए चिट्ठी लिखकर रख दी, और अपने घर को चल पड़ा। 


चैतु के जाने के बाद जब घुघुती की नींद खुली तो उसकी नज़र भिटौली की टोकरी, चिट्ठी और उसके गले की ज़ंजीर पर पड़ी। और उसे पता चल गया कि उसका भाई आया था। वह उसे न मिल पाने के कारण खूब रोई। वह इतना रोई कि उसकी सांसे सिकुड़ने लगी। घुघुती के आंसू तालाब बन चुके थे, जैसे पहाड़ पीछे से सरक कर घुघुती के सिरहाने आ गया हों! कुछ नहीं बचा था, सिवाय उसके आख़िरी शब्दों के: "घुघुती! भै भुखू, मैं सूती।"(मैं घुघुती, मैं सोती रही और मेरा भाई भूखा रहा।)


उसके आख़िरी शब्दों को उत्तराखंड के पहाड़ों ने संजो कर रख लिया। कहते हैं मरने के बाद घुघुती हमारे पहाड़ों की प्यारी चिड़िया बन गई। जिसे देखकर शादीशुदा औरतें मायके को याद करने लग जाती हैं। और लोकमान्यता है कि वह आज भी दोहराती है "घुघुती! भै भुखू, मैं सूती।"


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