छोटे जीव, बड़ी कहानियाँ
- Arpita Yadav

- Jun 27
- 4 min read
Updated: Jul 7
“बीटल्स क्या होते हैं?” मुनस्यारी की पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से प्रशिक्षण केंद्र में यह सवाल गूंजा तो कमरे में बैठे 25 स्कूली छात्र एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। जून की शुरुआत थी। बाहर बादलों की हल्की परतें जंगल की ढलानों को ढक रही थीं और भीतर हमारी चार दिनों की प्रकृति-यात्रा शुरू हो चुकी थी।

photo credits: mehak and arpita
1 से 4 जून 2026 के बीच नेचर साइंस इनिशिएटिव द्वारा आयोजित इस आवासीय इंटर्नशिप में हम उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर और नैनीताल जिलों से आए थे। हमें दो समूहों में बाँटा गया था। एक समूह पक्षियों और उनके व्यवहार को समझ रहा था, जबकि हमारा समूह कीट-पतंगों, मकड़ियों, तितलियों और मॉथ की दुनिया में उतरने वाला था।
पहले ही दिन मेंटर राम नारायणन ने हमारे सामने एक बीटल रखकर पूछा, “क्या तुम जानते हो कि दुनिया में कीटों की सबसे बड़ी संख्या किस समूह की है?” जब किसी के पास जवाब नहीं था, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हर चौथा जीव एक बीटल है।” यह सुनकर हम चौंक गए। जिस छोटे से कीड़े को हम अक्सर बिना देखे आगे बढ़ जाते हैं, उसकी दुनिया इतनी विशाल हो सकती है, यह हमने कभी सोचा ही नहीं था।

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बीटल को हाथ में लेकर देखने पर पता चला कि उसके चमकदार सख्त पंख केवल सजावट नहीं हैं। वे उसके असली, पारदर्शी और नाजुक पंखों की रक्षा करते हैं। उड़ान भरते समय वह अपने सख्त पंखों को कार के दरवाजों की तरह खोलता है और भीतर छिपे पंख बाहर निकालकर आसमान में उड़ जाता है।
उस दिन हमने कीड़ों के नाम याद करने से ज्यादा यह समझने की कोशिश की कि वे रहते कहाँ हैं, क्या खाते हैं और एक-दूसरे से अलग कैसे हैं। बीटल और ट्रू बग में अंतर क्या है? पौधों का रस चूसने वाले कीड़ों के मुंह कैसे बने होते हैं? लेडीबग वास्तव में बग नहीं, बल्कि बीटल क्यों है? धीरे-धीरे हमें एहसास होने लगा कि किसी जीव का नाम जानना उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना उसकी कहानी जानना।
अगले दिन हम एक भ्रमण पर निकले। उपोष्णकटिबंधीय जंगल की पगडंडी पर चलते हुए हमारी नजरें अब पेड़ों से ज्यादा उनकी शाखाओं के बीच फैले जालों पर टिकने लगी थीं। एक गोलाकार जाल धूप में चमक रहा था। यह ओर्ब वेब मकड़ी का घर था। पहली नजर में वह जाल किसी कलाकार की बनाई हुई आकृति जैसा लगता था। मकड़ी उसके बीचों-बीच शांत बैठी थी। उसकी आँखें कमजोर थीं, लेकिन जाल के तारों में आने वाला सबसे हल्का कंपन भी उसके लिए संदेश बन जाता था।

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कुछ दूर एक सुरंगनुमा जाल दिखाई दिया। यह फनल वेब मकड़ी का था। वह सुरंग के भीतर छिपकर अपने शिकार का इंतजार कर रही थी। जैसे ही कोई कीड़ा जाल में फँसता, कंपन उसे खबर दे देती है।
फिर हमारी मुलाकात जंपिंग स्पाइडर से हुई—मकड़ियों की दुनिया का सबसे चतुर शिकारी। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें किसी छोटे रोबोट जैसी लग रही थीं। वह अपने शरीर से कई गुना लंबी छलांग लगाकर शिकार तक पहुँच सकती थी।
एक अन्य मकड़ी ने तो हमें धोखा ही दे दिया। उसके जाल में सूखे पत्ते, कीड़ों के अवशेष और कूड़ा एक सीधी लाइन में सजा हुआ था। वह स्वयं भी उसी लाइन का हिस्सा बनकर बैठी थी। यह ट्रैशलाइन स्पाइडर थी, जो अपने दुश्मनों को भ्रमित करने की कला जानती है।
जंगल में चलते हुए हमें बार-बार बताया गया कि यदि मकड़ियाँ न हों तो कीटों की संख्या विस्फोटक रूप से बढ़ सकती है। फसलें प्रभावित होंगी और भोजन श्रृंखला का संतुलन बिगड़ जाएगा। अचानक मकड़ियाँ हमें डरावने जीव नहीं, बल्कि खेतों की अदृश्य रक्षक लगने लगीं।
लेकिन सबसे जादुई अनुभव रातों का था।

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शाम सात बजे के बाद एक सफेद पर्दा और विशेष रोशनी लगाई जाती। अंधेरे जंगल के बीच यह पर्दा किसी छोटे मंच की तरह चमकता रहता और कुछ ही देर में दूर-दूर से मॉथ यानि पतंगे आने लगते। कोई पत्ते जैसा दिखता, कोई सूखे फूल जैसा, तो कोई किसी कलाकार द्वारा बनाये गए एक बारीक चित्र जैसा। हमने सीखा कि अधिकांश पतंगे रात में सक्रिय होते हैं और रोशनी की मदद से दिशा भाँपते हैं। तितलियों और पतंगों में फर्क भी पहली बार स्पष्ट हुआ। तितलियों के एंटीना सीधे और सिरों पर गोल होते हैं, जबकि पतंगों के एंटीना अक्सर रोएँदार दिखाई देते हैं। तितलियाँ पंख ऊपर करके बैठती हैं, जबकि मॉथ उन्हें तंबू की तरह फैला लेते हैं। रात के अंधेरे में स्क्रीन पर उतरते इन परवानों को देखकर ऐसा लगता था जैसे जंगल अपनी छिपी हुई कहानियाँ हमारे सामने खोल रहा हो।

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तीसरे दिन हमारी नजरें घास के बीच उछलते जीवों पर थीं। टिड्डे लगातार छलांगें लगा रहे थे। उनके मजबूत पिछले पैर उन्हें हवा में उछाल देते थे। हमने जाना कि यही जीव बड़े झुंड बनाकर टिड्डी दल का रूप ले सकते हैं और फसलों को भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं।
फिर हमने फ्रॉगहॉपर देखा, जो टिड्डे से काफी छोटा था। उसके बच्चे पौधों पर सफेद झाग बनाते हैं, इसलिए उन्हें स्पिटलबग भी कहा जाता है। उसका चौड़ा सिर वास्तव में किसी छोटे मेंढक की याद दिलाता था।
रात ढलते-ढलते झाड़ियों से झींगुरों की आवाजें आने लगतीं। अपने पंखों को रगड़कर वे ऐसी ध्वनियाँ पैदा करते हैं जो जंगल के सन्नाटे को संगीत में बदल देती हैं।
चार दिनों में हमने केवल कीड़े-मकोड़े नहीं देखे। हमने उनके जीवन चक्र, उनकी रणनीतियाँ, उनके संघर्ष और उनके महत्व को समझा। एक बीटल का अंडे से लार्वा, लार्वा से प्यूपा और फिर उड़ान भरने वाले वयस्क में बदलना हो, या किसी मकड़ी का धैर्यपूर्वक अपने जाल के कंपन का इंतजार करना—हर जीव के पास एक कहानी थी। और उन कहानियों में कहीं न कहीं हमारी अपनी कहानी भी छिपी थी। क्योंकि जिन जीवों को हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, वे ही प्रकृति के विशाल ताने-बाने को जोड़कर रखते हैं। इंटर्नशिप खत्म होने के बाद जब हम घर लौटे, तो दुनिया वही थी। पेड़ वही थे, खेत वही थे और उनके बीच उड़ते-रेंगते जीव भी वही थे। बदला था तो केवल हमारा नजरिया।
अब किसी तितली, मकड़ी या बीटल को देखकर हम सिर्फ एक छोटा जीव नहीं देखते। हम प्रकृति की उस अद्भुत कहानी का एक पात्र देखते हैं, जिसके बिना यह संसार अधूरा है।
अर्पिता यादव ऊधम सिंह नगर स्थित नानकमत्ता पब्लिक स्कूल में कक्षा 11 की छात्रा हैं
सहयोग से कोएक्सिस्टेंस कंसोर्टियम










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