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पहाड़ों के रक्षक पक्षी

Sep 19
2 min read

image credits: wikimedia commons


उत्तराखण्ड  के ऊँचे–ऊँचे देवदार के जंगलों में कई सुंदर पक्षी रहते थे—रंग-बिरंगा मोनाल, मीठी आवाज़ वाली बुलबुल, तेज़ उड़ने वाला कबूतर, और छोटी लेकिन चमकीली सनबर्ड। हर सुबह ये सभी पक्षी सूरज निकलते ही मिलकर गाना गाते थे। जंगल में उनकी आवाज़ गूँजती थी और पूरा वातावरण खुशियों से भर जाता था।

एक दिन जंगल में खतरा दिखा…

मोनाल ने देखा कि कुछ लोग घूमते-फिरते कचरा फेंक रहे हैं। रास्ते पर प्लास्टिक और खाने के रैपर पड़े थे। मोनाल चिंतित होकर बोला, “अगर यह सब ऐसे ही चलता रहा तो हमारा सुंदर जंगल खराब हो जाएगा।” बुलबुल ने कहा, “हमें जंगल की रक्षा करनी चाहिए। हम छोटे हैं, लेकिन अपनी आवाज़ से सबको समझा सकते हैं।”


पक्षियों ने मिलकर योजना बनाई। सब पक्षियों ने तय किया कि वे–

1. जंगल में कचरा देखकर उसे एक जगह इकट्ठा करेंगे, 

2. और आने वाले लोगों को अपने गीतों और इशारों से साफ–सफाई का संदेश देंगे।


अगली सुबह…

कुछ यात्री आए और आराम से बैठकर खाना खाने लगे। कबूतर उड़कर उनके बैग के पास बैठ गया और “गुटर-गूँ” करता रहा। सनबर्ड खाली बोतल की ओर बार-बार उड़कर इशारा करने लगी। बुलबुल ने तेज़ और मीठी आवाज़ में गाना शुरू किया, जिससे यात्री उन पर ध्यान देने लगे।


यात्री ने मुस्कुराते हुए कहा,“ये पक्षी कुछ कहना चाहते हैं… शायद हमसे सफाई रखने को कह रहे हैं!” फिर उन्होंने सारा कचरा उठाया और बैग में रख लिया।जंगल में फिर खुशहाली लौट आई। पक्षी उत्साहित हो गए। मोनाल ने खुशी में अपने चमकीले पंख फैला दिए और बोला, “देखा! थोड़े से प्रयास से हम अपने जंगल को बचा सकते हैं।” उस दिन से सभी पक्षी “जंगल रक्षक” कहलाए। उनकी बदौलत वह जंगल फिर से साफ, हरा-भरा और सुन्दर दिखने लगा। जंगल में आ रहे हर जीव को समझ आया कि प्रकृति हमें जीवन देती है, इसलिए,  उसकी देखभाल करना हर जीव का कर्तव्य है।



कुणाल भट्ट कक्षा 8 के छात्र हैं और कमलुवागांजा, हल्द्वानी (उत्तराखण्ड) में रहते हैं। वह स्वस्त्यायन सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें कहानियाँ पढ़ना, चित्र बनाना और नई-नई बातें सीखना पसंद है।


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